आशा से हुलसना और आशंका से झुलसना
बहुत पहले एक उपन्यास में पढ़ा था कि आशा से हुलसना और आशंका से झुलसना खत्म होते ही प्यार मर जाता है. मगर जबतक आशा से हुलसना और आशंका से झुलसना बन्द नहीं कर पाइयेगा तब तक आप एक सफल वणिक नहीं बन सकते. क्योंकि वणिकई - trading - में आशा और आशका का द्वन्द्व हमेशा चलता रहता है और एक सफल वणिक को इससे मुक्त होना बहुत ही जरुरी होता है.
और यहीं याद आ जाती है शिवमंगल सिंह 'सुमन' की एक कविता -
यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खंडहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्व की संपत्ति चाहूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
- शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
(साभार - कविता कोश )
अलग बात है कि एक बार भारत के पूर्व प्रधानमंत्री कवि हृदय स्व. अटल बिहारी बाजपेयी ने इस कविता का पाठ कर के इसे इतना विस्तार दे दिया कि बहुतों को लगता है कि यह उन्हीं कि कविता है.
कवि ने इस कविता को जिस भी अभिप्राय से लिखा हो पर आज मैं इस कविता का उपयोग वणिकई के सन्दर्भ में करने जा रहा हूं. आशा से हुलसना और आशंका से झुलसना बन्द कर देना ही पर्याप्त नहींं है.
शिवमंगल जी कि कविता की पंक्ति है -
यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
एक वणिक को इससे यही सन्देश ग्रहण करना चाहिये कि वणिकई में मिली हार जीवन का अन्त नहीं. मुझे वणिकई आती नहीं पर -
तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
मैँ यह संग्राम जीतने के लिये लड़ता रहूंगा. किसी से कोई टिप्स नहीं लूंगा. किसी दूसरे की सलाह पर मैं अपना ट्रेड कदापि नहीं लूंगा.
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
मेरा ट्रेड मुझे लाभ दे या नुकसान, मैं अपने निर्णय के हिसाब से, अपनी रणनीति के हिसाब से ही ट्रेड करूंगा. और इस क्रम में जो भी परिणाम आए मैं उसका स्वागत करूंगा. किसी दूसरे की सलाह पर मैं कोई सौदा नहीं करुंगा.
लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
मेरी अनुभव हीनता का आभास दिलाना जरुरी नहीं. तुम बहुत बड़े वणिक हो बने रहो, मैं अपनी स्वंय की रणनीति का त्याग नहीं करने जा रहा. किसी भी स्थिति में मैं आपसे सलाह नहीं मांगने जा रहा.
चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
तुम मुझे कितना भी बेवकूफ समझो. मुझे कितना भी बुरा भला कहो पर मैं अपनी योजना, अपनी रणनीति छोड़ने नहीं जा रहा. किसी भी स्थिति मे मैं आपसे सलाह नहीं लेने जा रहा.
आप को भी लगता होगा कि यह शैली तो निश्चित गर्त में ले जायेगी. पर यह उतना निश्चित भी नहीं जितना आप इसे बतलाने की कोशिश करेंगे. अपनी रणनीति पर टिके रहने का अर्थ यह नहीं होता कि आप अपने अस्त्रों को धार देना बन्द कर देंगे. बढ़िया से बढ़िया रणनीति भी शत प्रतिशत सफलता नहीं देती. आप को अपने पसन्द की रणनीति, अपनी क्षमता के अनुसार योजना बनाना ही होगा. जैसे जैसे आप इस मार्ग पर आगे बढ़ते जायेंगे आप अपनी असफलताओं से सीखते भी जायेंगे और तदनुसार अपनी योजना में अेक्षित सुधार भी करते जायेंगे.
और शोध प्रबन्ध लिखने बैठने से पहले जरुरी है कि आपने अपनी शुरुआत ककहरा सीख कर ही करें. गुरु से ज्ञान लेना चाहिये पर अपने मार्ग पर उस ज्ञान का प्रयोग अपने अनुभवों से परिमार्जित भी करते रहना चाहिये.