Monday, March 16, 2026

बैठा बनिया क्या करे, इस डेहरी से उस डेहरी में


बात आगे बढ़ाऊँ उससे पहले रहीम का एक दोहा याद दिला रहा हूं। रहीम जी ने कहा था -
रहिमन चुप ह्वै बैठिए देखि दिनन को फेर।
जब नीके दिन आइहें बनत न लगिहें देर।।

सबको पता था कि रहीम जी के जमाने में शेयर बाजार जैसी कोई व्यवस्था नहीं होती थी। इसलिए उन्होंने यह बात सामाजिक व्यक्तिगत परिस्थितियों के लिए ही लिखी होगी। पर यह सीख शेयर बाजार के लिए भी व्यावहारिक है।

आम आदमी कहा करता है कि -
रहे न जब सुख के दिन ही तो कट जाऐंगे दुख के दिन भी।

सही बात है। प्रकृति का क्रम भी इसी तरह चलता है। दिन के बाद रात, रात के बाद दिन। जब हम धुप्प अंधेरे से चकाचौंध वाली रोशनी में आते हैं या रोशनी से अंधेरे में पँहुचते हैं तो थोड़ी देर के लिए हमें कुछ भी नहीं दिखता। शेयर बाजार कभी भी सीधी रेखा में नहीं चलता। आड़ी तिरछी लकीर बनाते चलता है। ईरान-इजरायल युद्ध के बाद भी ऐसी परिस्थिति बन गई है जिसमें आम निवेशक हतप्रभ है। उसे कुछ सूझ नहीं रहा कि क्या करे। वणिक भी परेशान हैं। उन्हें भी समझ  नहीं आ रहा। बाजार इतना गिरा हुआ है कि बिकवाली में भी खतरा बन गया है और हालात इतने अनिश्चित हैं कि खरीददारी भी जोखिम वाली बन गई है।

आजकल मैं भी फुरसत में हू। कहा जाता है कि शेयर बाजार में कुछ नहीं खरीदना, कुछ नहीं बेचना भी एक निर्णय होता है और यह एक सुरक्षित तरीका भी होता है अपनी जमा-पूंजी बचाए रखने की। पर अपनी तो आदत है कि जब बाजार बन्द है तब भी मार्केट का चार्ट रिप्ले करता रहता हूं कुछ नया  अनुभव करने के लिए। इसी दौरान मैंने दो शेयरों पर बैकटेस्ट किया। बाजार 1 जनवरी 2025 से 14 मार्च तक का लिया। बैकटेस्टिंग बहुत कुछ चुनाव पूर्व आकलन की तरह ही होता है। जनता का मूड बताता तो है पर पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि ऐसा ही होने जा रहा है। शायद मैंने आपको इसी बहाने चेतावनी दे दी कि यह महज एक परीक्षण है, इसका निष्कर्ष परम सत्य नही है। बाजार में कुछ भी हो सकता है। 

आधिकतर रिटेलर निवेशक/वणिक की बड़ी बीमारी होती है कि वे स्टॉपलॉस लगाना पसन्द नहीं करते, गिरते शेयरों को बेचना भी उन्हें गवारा नहीं होता। सो वे घाटा दे रहे शेयरों को तो सँजोये रहते हैं पर छोटा लाभ भी हजम नहीं हो पाता तुरत बेच कर निकल लेते हैं यह सोच कर कि पता नहीं यह भी कल मिलेगा कि नहीं। बात सही भी है। कल किसने देखा है और बाजार में कुछ भी हो सकता है।

सो मैंने एक ऐसी रणनीति बनाई जो किसी इंडिकेटर, किसी प्राइस एक्शन पर आधारित नहीं रहता। सारा दिन चार्ट देखते रहने की जरूरत भी नहीं इसके लिए। अब देखिए कि मैंने इस बैकटेस्टिंग में किया क्या? एक ब्लूचिप चुना और उसका डे चार्ट देखते हुए काल्पनिक सौदे किए। तय किया कि बाजार बन्द होते समय अगर कैन्डिल स्तम्भ हरा है तो उसे खरीद लेना है मार्केट रेट पर। रोज यही करते रहना है। जब भी बाजार उपर जाय और कैन्डल हरा बने तो उस दिन बाजार बन्द होते समय खरीद लेना है, हर बार। बिना कोई दिमाग लगाए।
 
पर आम आदमी ऐसे सौदे कितने दिन कर सकता है? तो इसके लिए तय माना गया कि जितनी  पूंजी उपलब्धबद्ध हो उसको बीस हिस्से में बाँट दीजिए और हर बार एक हिस्से को खरीदने में लगाना है। अब चूंकि हर बार इतना समय नहीं होता गुणा भाग करने के लिए कि कितना खरीदा जाय। मूल्य तो देखना नहीं बस कैन्डल का रंग देखना है। सो एक मोटा मोटी अनुमान लगाईए कि उस सीमा में कितने शेयर खरीदे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए अगर आपकी कुल क्षमता दो लाख रुपये की है तो हर बार दस हजार की खरीद करनी है। अब मान लीजिए कि आपने जो शेयर चुना इस काम के लिए उसका उस दिन का मूल्य 800 से 1000 के बीच का है। तो आपको हर बार दस शेयर खरीदने हैं। अगर मूल्य 200 से 300 के बीच है तो हर बार तीस शेयर खरीदने हैं। 

पता नहीं यह संयोग ही था या कोई फिबोनाची पर अधिकतर मुझे बीस बार की काल्पनिक खरीददारी करनी पड़ी बेचने के पहले। याद दिला देता हूं काल्पनिक। आप इसे वास्तविकता मत समझ लीजिएगा। 

मैंने खरीदने का तरीका तो बता दिया पर बेचना कब है? साँप के जहर की काट नहीं मालूम तो साँप के बिल में हाथ डालना बेवकूफी ही नहीं आत्महत्या की कोशिश ही होगी। खरीदने के लिए तो मैंने बाजार बन्द होने का समय चुना। मात्र दस से पन्द्रह मिनट देने हैं इसके लिए। बेचने का फैसला सुबह बाजार खुलने से पहले ही कर लेना होगा। किस दाम पर? इसका फैसला आपने तब तक जो पूंजी लगाई है उसमें तीन प्रतिशत जोड़ कर बाजार ले प्री-मार्केट टाइम में लगा देना है बेचने के लिए। बिक गया तो आपको तब तक के कुल लागत पर तीन प्रतिशत का लाभ हो गया। इसी में से ब्रोकरेज और अन्य चार्जेज कटने हैं और मुनाफे पर सो लांग-शॉर्ट कैपिटल गेन टैक्स लगने वाला है। मौत की तरह टैक्स भी शाश्वत है। इससे बचा नहीं जा सकता अगर लाभ लेना है तब। अगर बिक गया तो अच्छा, नहीं बिका तब भी कोई चिन्ता नहीं। शाम को फिर खरीदने का मौका देखना है। कैन्डल हरा है तो खरीदना है, लाल है तो कुछ नहीं करना।

अगले दिन फिर तब तक की लागत पर मुनाफा जोड़ कर बेचने के लिए लगा देना है। बिका तो अच्छा। नहीं बिका तो भी अगली खरीददारी तो करती ही रहनी है। मैंने पाया कि अधिकतम बीस बार खरीदना पड़ा। मान लीजिए कि आप को बीस बार खरीदने के बाद भी बेचने का मौका नहीं मिला तो क्या करना है? पूंजी तो पूरी लग चुकी है। यहीं रहीम जी  का वह दोहा काम आएगा कि - रहिमन चुप ह्वै बैठिए....।

पर जब मैंने इसे स्टेट बैंक आफ इण्डिया या टाटा स्टील पर बैक टेस्ट किया तो अन्त में लगभग बीस फीसदी का मुनाफा हुआ. पन्द्रह महीने में बीस फीसदी बढ़िया नहीं लगा तो कुल पूंजी फिक्स्ड डिपाजिट मे डाल दीजिए. सात आठ फीसदी ब्याज तो मिल ही जाएगा। टैक्स तो वहाँ भी लगेगा ही!

मैंने तो इसे स्टेट बैंक आफ ईण्डिया तथा टाटा स्टील पर जाँचा-परखा। आप इस रणनीति को किसी दूसरे शेयर पर कर के देख लीजिए। काम का लगे तो लग जाइए, नहीं लगा तो राम भजिए!

पर खबरदार! मेरी सलाह पर कुछ खरीदना या बेचना नहीं है। भगवान ने आपको भी तो बुद्धि दी ही है और कहा तो यही जाता है कि अपनी अक्ल और दूसरे की संपति हमेशा ज्यादा दिखती है। तो मेरी सलाह पर अपना नुकसान कराने को किसने कहा है। नमस्कार, प्रणाम। चलता हूँ अब। मन करे तो बीच-बीच में आते रहिएगा इस ब्लॉग पर - 
https://itishri.blogspot.com/

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